राजस्थान के धार्मिक एवं कलात्मक दिगम्बर जैन मंदिरों में कोटा के आर.के. पुरम स्थित १००८ श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन मंदिर (त्रिकाल चौबीसी) अतिशय क्षेत्र का अपना विशिष्ठ महत्व है। हाडौती का यह प्रथम त्रिकाल चौबीसी मंदिर हैं। मंदिर में भूतकाल, वर्तमान काल एवं भविष्य काल के चौबिस अवतारों को यहां वेदियों पर कलात्मक गुम्बज बनाकर स्थापित किया गया है।
मंदिर का विशाल मण्डप तीन तलों में बना है। भूतल पर मुनिसुव्रत भगवान की सवा पांच फुट ऊँची श्यामवर्णीय प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में ऊंची वेदी पर कमल पुष्प आसन पर स्थापित की गई है। स्वर्ण आभामण्डलयुक्त प्रतिमा के चेहरे पर मुस्कराहट और शांत भाव देखते ही बनता है। प्रतिमा के ऊपर चांदी का छत्र नजर आता है जिसका ऊपर का भाग एक फुट, मध्य का भाग डेढ फुट एवं नीचे का भाग २ फुट है। प्रतिमा के पार्श्व में ६४ चंवर, अष्ट प्रतिहार तथा इन्द्र का अंकन स्वर्ण स्वरूप लिए अन्य उत्कीर्ण अत्यंत मनोरम प्रतीत होते हैं। मुनिसुव्रत भगवान की प्रतिमा के सामने वेदी पर भगवान महावीर स्वामी, आदिनाथ, पार्श्वनाथ एवं वासुपूज्य आदि की लघु पीतल धातु से निर्मित प्रतिमाऐं हैं। मार्बल पत्थर से बनी वेदी पर सोने के काम से १६ स्वप्नों का अंकन किया गया है। प्रतिमा के दायें एवं बायें दिवारों में बड़े दर्पण लगाये गये है, जिनसे किसी भी कोण से देखने पर प्रतिमा के सैकडों बिम्ब नजर आते हैं| बताया जाता है कि जहां वर्तमान मुनिसुव्रत भगवान की प्रतिमा स्थापित है, वहां पूर्व में पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित थी, जिसे अब तीसरे तल पर स्थापित कर दिया गया है। इस प्रतिमा को कोटा जिले के इटावा क्षेत्र के गांव ककरावदा से यहां लाया गया था।
सभागार में दाई एवं बाई ओर भूतकाल के चौबिस तीर्थंकरों की चौबीसी बनाई गई है। सभागार में ही एक पुस्तकालय संचालित है। सभागार के द्वितीय तल पर वर्तमान चौबीसी प्रथम तीर्थकर आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक की चौबीसी बनाई गई है। तृतीय तल पर भव्य पार्श्वनाथकी श्यामवर्णीयप्रतिमाओं के दोनों ओर भविष्यकाल की चौबीसी बनाई गई है। तीन काल की चौबीसी बनी होने से इसे त्रिकाल चौबीसी कहा जाता है।मंदिर के सभामण्डप के बाहर प्रवेशद्वार पर सफेद मार्बल पत्थर से बनाई श्रृंगार चौकी का स्थापत्य शिल्पदेखते ही बनता है। मंदिर के ऊपर तीन कलात्मक एवं कारीगरी युक्त शिखरबनाये गये हैं| मंदिर के मुख्य प्रवेष द्वारके सामने ५१ फुट ऊंचा मानस्तंभ बनाया गया है। बताया जाता है कि राजस्थान के जैन मंदिरों में बने मानस्तंभों में यह सबसे ऊंचा है। जिस पार्क में यह मंदिर बना है, वहीं गुरूद्वारा व हनुमान मंदिर भी हैं इसलिए इस क्षेत्र को टेम्पल पार्क के नाम से भी जाना जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मुनिसुव्रत दिगम्बर जैन मंदिर में लगाये गये एक शिलालेख के मुताबित मुनि श्रीचिन्मय सागरजी महाराज का इस जिनालय में १३ मई २००७ को मंगल आगमन हुआ। उन्होंने पिछले ९ वर्षोसे निर्माणाधीन जिनालय के वास्तुदोषों को पहचान कर उन्हें दूर करने के निर्देशदेते हुए समाज का उचित मार्गदर्शन किया औरसमाज के आग्रह को स्वीकार कर ७ जून २००७ को मंदिर (त्रिकाल चौबीसी) की मुख्य वेदी का शिलान्यास संपन्न कराया। उन्होंने कोलीपुरा के जंगल में दो माह तक तपस्या कर न केवल साढे पांचमाह में मंदिर का कार्य पूर्ण कराया वरण २१ से २४ जनवरी २००८ को भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव कार्यक्रम भी संपन्न कराया। मुनिश्री की प्रेरणा से इस मंदिर में राजस्थान का सबसे ऊंचा गगनचुंभी धवल मार्बल से नक्काशीदार कलात्मक मानस्तंभ का निर्माण, तीन भव्य शिखर, सभा मण्डप का निर्माण हुआ।मुनिश्री का ६ जनवरी २०१३ को पुनः मंगल आगमन हुआ तथा समाज को भव्य श्रृंगार चौकी बनाने के निर्देशदेकर आशीर्वादप्रदान किया। मुनिश्री चिन्मयसागरजी महाराज के आशीर्वाद से यह जिनालय आज त्रिकालचौबीसी दिगम्बर जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र के नाम से जगत में ख्याती अर्जित कर चुका है।
इससे पूर्व वर्ष२००० के पर्युषण पर्व को टेम्पल पार्क में मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। दो दिन व दो रात्री में एक छोटे जिनालय का निर्माण कर भगवान पार्श्वनाथ की नौफणी श्यामवर्ण प्रतिमा (जो अब द्वितीय तल पर विराजमान है) को स्थापित कर किया गया|दिनांक १८ फरवरी २००१ को ग्राम ककरावदा (त. इटावा, जिला कोटा) के जिनालय से अत्यन्त प्राचीन व चमत्कारिक प्रतिमाओं को लाकर भव्य रथयात्रा व वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव में प्रतिमाओं को वेदी में विराजमान किया गया। वर्ष२००८ में इस मंदिर का नाम ‘१००८ श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन मंदिर (त्रिकाल चौबीसी)’ अतिशय क्षेत्र हुआ।
(डा. प्रभात कुमार सिंघल)
मंदिर का विशाल मण्डप तीन तलों में बना है। भूतल पर मुनिसुव्रत भगवान की सवा पांच फुट ऊँची श्यामवर्णीय प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में ऊंची वेदी पर कमल पुष्प आसन पर स्थापित की गई है। स्वर्ण आभामण्डलयुक्त प्रतिमा के चेहरे पर मुस्कराहट और शांत भाव देखते ही बनता है। प्रतिमा के ऊपर चांदी का छत्र नजर आता है जिसका ऊपर का भाग एक फुट, मध्य का भाग डेढ फुट एवं नीचे का भाग २ फुट है। प्रतिमा के पार्श्व में ६४ चंवर, अष्ट प्रतिहार तथा इन्द्र का अंकन स्वर्ण स्वरूप लिए अन्य उत्कीर्ण अत्यंत मनोरम प्रतीत होते हैं। मुनिसुव्रत भगवान की प्रतिमा के सामने वेदी पर भगवान महावीर स्वामी, आदिनाथ, पार्श्वनाथ एवं वासुपूज्य आदि की लघु पीतल धातु से निर्मित प्रतिमाऐं हैं। मार्बल पत्थर से बनी वेदी पर सोने के काम से १६ स्वप्नों का अंकन किया गया है। प्रतिमा के दायें एवं बायें दिवारों में बड़े दर्पण लगाये गये है, जिनसे किसी भी कोण से देखने पर प्रतिमा के सैकडों बिम्ब नजर आते हैं| बताया जाता है कि जहां वर्तमान मुनिसुव्रत भगवान की प्रतिमा स्थापित है, वहां पूर्व में पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित थी, जिसे अब तीसरे तल पर स्थापित कर दिया गया है। इस प्रतिमा को कोटा जिले के इटावा क्षेत्र के गांव ककरावदा से यहां लाया गया था।
सभागार में दाई एवं बाई ओर भूतकाल के चौबिस तीर्थंकरों की चौबीसी बनाई गई है। सभागार में ही एक पुस्तकालय संचालित है। सभागार के द्वितीय तल पर वर्तमान चौबीसी प्रथम तीर्थकर आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक की चौबीसी बनाई गई है। तृतीय तल पर भव्य पार्श्वनाथकी श्यामवर्णीयप्रतिमाओं के दोनों ओर भविष्यकाल की चौबीसी बनाई गई है। तीन काल की चौबीसी बनी होने से इसे त्रिकाल चौबीसी कहा जाता है।मंदिर के सभामण्डप के बाहर प्रवेशद्वार पर सफेद मार्बल पत्थर से बनाई श्रृंगार चौकी का स्थापत्य शिल्पदेखते ही बनता है। मंदिर के ऊपर तीन कलात्मक एवं कारीगरी युक्त शिखरबनाये गये हैं| मंदिर के मुख्य प्रवेष द्वारके सामने ५१ फुट ऊंचा मानस्तंभ बनाया गया है। बताया जाता है कि राजस्थान के जैन मंदिरों में बने मानस्तंभों में यह सबसे ऊंचा है। जिस पार्क में यह मंदिर बना है, वहीं गुरूद्वारा व हनुमान मंदिर भी हैं इसलिए इस क्षेत्र को टेम्पल पार्क के नाम से भी जाना जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मुनिसुव्रत दिगम्बर जैन मंदिर में लगाये गये एक शिलालेख के मुताबित मुनि श्रीचिन्मय सागरजी महाराज का इस जिनालय में १३ मई २००७ को मंगल आगमन हुआ। उन्होंने पिछले ९ वर्षोसे निर्माणाधीन जिनालय के वास्तुदोषों को पहचान कर उन्हें दूर करने के निर्देशदेते हुए समाज का उचित मार्गदर्शन किया औरसमाज के आग्रह को स्वीकार कर ७ जून २००७ को मंदिर (त्रिकाल चौबीसी) की मुख्य वेदी का शिलान्यास संपन्न कराया। उन्होंने कोलीपुरा के जंगल में दो माह तक तपस्या कर न केवल साढे पांचमाह में मंदिर का कार्य पूर्ण कराया वरण २१ से २४ जनवरी २००८ को भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव कार्यक्रम भी संपन्न कराया। मुनिश्री की प्रेरणा से इस मंदिर में राजस्थान का सबसे ऊंचा गगनचुंभी धवल मार्बल से नक्काशीदार कलात्मक मानस्तंभ का निर्माण, तीन भव्य शिखर, सभा मण्डप का निर्माण हुआ।मुनिश्री का ६ जनवरी २०१३ को पुनः मंगल आगमन हुआ तथा समाज को भव्य श्रृंगार चौकी बनाने के निर्देशदेकर आशीर्वादप्रदान किया। मुनिश्री चिन्मयसागरजी महाराज के आशीर्वाद से यह जिनालय आज त्रिकालचौबीसी दिगम्बर जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र के नाम से जगत में ख्याती अर्जित कर चुका है।
इससे पूर्व वर्ष२००० के पर्युषण पर्व को टेम्पल पार्क में मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। दो दिन व दो रात्री में एक छोटे जिनालय का निर्माण कर भगवान पार्श्वनाथ की नौफणी श्यामवर्ण प्रतिमा (जो अब द्वितीय तल पर विराजमान है) को स्थापित कर किया गया|दिनांक १८ फरवरी २००१ को ग्राम ककरावदा (त. इटावा, जिला कोटा) के जिनालय से अत्यन्त प्राचीन व चमत्कारिक प्रतिमाओं को लाकर भव्य रथयात्रा व वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव में प्रतिमाओं को वेदी में विराजमान किया गया। वर्ष२००८ में इस मंदिर का नाम ‘१००८ श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन मंदिर (त्रिकाल चौबीसी)’ अतिशय क्षेत्र हुआ।
(डा. प्रभात कुमार सिंघल)
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