रंगीले राजस्थान में वैसे तो कई पर्यटन स्थल हैं, जो वहां की संस्कृति एवं संपन्नता का जीवंत परिचय देती है और इसलिए ही राजस्थान सिर्फ छुट्टियों में ही नही बल्कि पुरे वर्ष देश और विदेश से इन स्थानों पर घूमने आते हैं। इन्ही स्थानों में से एक है मेनाल। यह स्थल अपने नैसर्गिक वैभव, कई प्राचीन मंदिरों तथा वाटर फॉल आदि के लिए बेहद जाना जाता है, जिस कारण से बहुत से पर्यटकों की रूचि का केंद्र सालों से बना हुआ है। बता दें कि मेनाल को 1956 से भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया हुआ है। वर्तमान में यहां की देखभाल पुरातत्व विभाग करता है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर विभाग द्वारा एक होटल भी स्थापित किया गया है।
बारिश के दौरान मेनाल का झरना अपने रूप में आने लगता है और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। यहां आकर इस झरने में नहाने का अपना अलग ही आनंद है। इस सब के बाद भी मेनाल का वॉटरफॉल व प्राचीन शिव मन्दिर पर्यटकों के आकर्षण के प्रमुख केन्द्र है। इन्हें देखने के लिए हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक यहां आते है। इस क्षेत्र की जमीन अत्यधिक ढलान वाली है, जहां पर बारिश का पानी ठहर नही पाता है और तेजी से बहकर झरने की ओर बढ़ता है। वैसे यहां पर इतनी सारी खासियतों के बीच फिसलन का खतरा होता है और पानी व रोशनी की समस्या यहां पर आपके आनंद का मजा बिगाड़ सकते है। लेकिन न कहना गलत नही होगा कि यह स्थान पुरातत्व, धर्म और पर्यटन का अनोखा संगम है और इसे देखने के बाद आप इसके मुरीद बने बिना नही रह सकते|
कहां और कैसा है मेनाल: मेनाल चित्तौड़ राजमार्ग पर बसे बूंदी से करीब 100 किमी दूरी पर तथा चित्तौड़ से करीब 70 किमी की दूरी पर स्थित है। यह स्थान यूं तो छोटा ही है पर ऐतिहासिक महाकाल मंदिर और अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है। इस स्थान पर मेनाल नामक नदी है, जो कि एक झरने के रूप में 150 फ़ीट गहरे गड्ढे में गिरती है और एक घाटी का निर्माण करती है। इस झरने रुपी नदी का पानी ऊपर से ग्रेनाइट की सख्त चट्टानो पर जिस स्थान पर गिरता है, उस स्थान के ठीक दाहिनी और शिवालय तथा महानाल मठ स्थित है। महानाल मठ के परिसर में और भी कई मंदिर बने है, जिनको आप वहां देख सकते है| कहा जाता है किइन मंदिरों का निर्माण दिल्ली और अजमेर के राजपूत राजाओं ने अपने कार्यकाल में कराया था। 10 वीं और 11 वीं शताब्दी में यह महानाल मठ शैव संप्रदाय का प्रसिद्ध स्थान रहा है। यहां का महानालेश्वर मंदिर और शिव मंदिर काफी खूबसूरत है। मंदिरों की दीवार पर काफी कलात्मकता दिखाई पड़ती है और बहुत सी मूर्तियां भी बनी हुई हैं। मेनाल में वैसे तो पुरे साल भर लोग घूमने के लिए आते रहते हैं पर यहां पर आने का सबसे अच्छा समय बरसात का ही है। उस समय मेनाल का झरना बहुत ज्यादा तेजी से तेज आवाज के साथ नीचे गिरता है तथा उसकी जलराशि पर अनेकों इंद्रधनुष सजते हैं और साथ ही चारों ओर बहुत ज्यादा हरियाली भी होती है।
क्या देखें:
प्राचीन शिव मन्दिर: यहां का सबसे पुराना शिव मन्दिर 1100 ईस्वी पूर्व पृथ्वीराज चौहान द्वारा बनवाया गया व यहां के मुख्य द्वार का निर्माण करवाया गया। यह ऊपरमाल क्षेत्र का सबसे पुराना शिव मन्दिर है। 1170 ईस्वी में रानी सुहिया ने झरने के उस पार एक और शिव मन्दिर और महल का निर्माण करवाया। इन दोनों शिव मन्दिरों में कलाकारों द्वारा कलाकृतियां बनाई गई। राजस्थान में स्थान-स्थान पर बने शिवालयों से यही प्रकट होता है कि ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक राजस्थान में शैव मत की ही प्रधानता रही है| समूह का प्रमुख और सबसे सुंदर महानालेश्वर मंदिर शिव को समर्पित है| मंदिर के सामने एक छतरी के नीचे नंदी की बड़ी सी मूर्ति बनी है| मंदिर भूमिज शैली में बना है| मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं, अप्सराओं, हाथियों, शेरों आदि की जीवंत कलात्मक मूर्तियां लगाई गई हैं| इनके आस-पास के पत्थरों पर बेल-बूटे बनाए गए हैं| मंदिर शिखर के कुछ नीचे एक शेर की मूर्ति है तथा मंडप के ऊपर एक शेर अपनी सुरक्षा में एक हाथी-शावक लिए बना है| नेशनल हाईवे 27 पर भीलवाड़ा से 70 किलोमीटर और चित्तौडगढ़ से 80 किलोमीटर की दूरी पर मेनाल का वॉटरफॉल स्थित है। थोड़ी बारिश के बाद यहां पर प्राकृतिक झरना शुरू हो जाता है, जो लगभग 150 फीट की ऊंचाई से गिरता है। जो पर्यटकों के बीच आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। पर्यटक बारिश के दिनों में इस झरने का लुत्फ उठाने आते हैं। इस झरने में बारिश का पानी आरोली, मेनाल व जोगणिया माता के जंगलों से बहकर आता हैं।
क्या देखें:
प्राचीन शिव मन्दिर: यहां का सबसे पुराना शिव मन्दिर 1100 ईस्वी पूर्व पृथ्वीराज चौहान द्वारा बनवाया गया व यहां के मुख्य द्वार का निर्माण करवाया गया। यह ऊपरमाल क्षेत्र का सबसे पुराना शिव मन्दिर है। 1170 ईस्वी में रानी सुहिया ने झरने के उस पार एक और शिव मन्दिर और महल का निर्माण करवाया। इन दोनों शिव मन्दिरों में कलाकारों द्वारा कलाकृतियां बनाई गई। राजस्थान में स्थान-स्थान पर बने शिवालयों से यही प्रकट होता है कि ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक राजस्थान में शैव मत की ही प्रधानता रही है| समूह का प्रमुख और सबसे सुंदर महानालेश्वर मंदिर शिव को समर्पित है| मंदिर के सामने एक छतरी के नीचे नंदी की बड़ी सी मूर्ति बनी है| मंदिर भूमिज शैली में बना है| मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं, अप्सराओं, हाथियों, शेरों आदि की जीवंत कलात्मक मूर्तियां लगाई गई हैं| इनके आस-पास के पत्थरों पर बेल-बूटे बनाए गए हैं| मंदिर शिखर के कुछ नीचे एक शेर की मूर्ति है तथा मंडप के ऊपर एक शेर अपनी सुरक्षा में एक हाथी-शावक लिए बना है| नेशनल हाईवे 27 पर भीलवाड़ा से 70 किलोमीटर और चित्तौडगढ़ से 80 किलोमीटर की दूरी पर मेनाल का वॉटरफॉल स्थित है। थोड़ी बारिश के बाद यहां पर प्राकृतिक झरना शुरू हो जाता है, जो लगभग 150 फीट की ऊंचाई से गिरता है। जो पर्यटकों के बीच आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। पर्यटक बारिश के दिनों में इस झरने का लुत्फ उठाने आते हैं। इस झरने में बारिश का पानी आरोली, मेनाल व जोगणिया माता के जंगलों से बहकर आता हैं।
मेनाल के आस-पास के पर्यटक स्थाल: मेनाल के साथ में आप चित्तौडग़ढ़ और बूंदी भी घूम सकते हैं। यहां पर उम्मेद भवन पैलेस और चित्रशाला भी देखने लायक जगह है। चित्रशाला की दीवार आपको रासरंग की बहुत सी कहानिया चित्रों के माध्यम से दिखाती हुई मिलेगी| वहीँ दूसरी और चित्तौडग़ढ़ शहर अपने मंदिरों, दुर्गो और किलों के लिए बहुत मशहूर है| यहां पर आप बहुत से किले और मंदिरों का आनंद ले सकते हैं। मेनाल के साथ-साथ आप सेवन फॉल और मिंडकी महादेव के झरनों का आनंद उठा सकते है| इसके अलावा बिजौलिया से मात्र 8 किमी दूर भड़क्या माताजी के जलप्रपात का भी लुफ्त उठा सकते हैं, जो कि काफी प्रसिद्ध है। खोकी और कनेर की पुतलियां नामक झरना भी यहां काफी लोकप्रिय है, जो कि खनिज क्षेत्र सुखपुरा खड़ीपुर में स्थित है।
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