जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान की अधिष्ठात्री गरुड़ वाहिनी, चक्रधारिणी चक्रेश्वरी देवी का एकमात्र ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर, सरहिंद शहर के चंडीगढ़ रोड पर स्थित है। जैन संस्कृति में प्रत्येक तीर्थंकर के यक्ष-यक्षिणी होते हैं, जिन्हें ‘शासनदेव’ और ‘शासनदेवी’ कहते हैं। ये तीर्थंकर की अनन्य भक्ति करने वालों की अनेक प्रकार से रक्षा करने के साथ सभी कष्टों का निवारण और सभी कामनाओं को पूर्ण भी करते हैं। सोलह विद्यादेवियों में से एक विद्या देवी चक्रेश्वरी माता भी हैं। चक्रेश्वरी माता ‘अप्रतिहतचक्रा’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। ‘निर्वाण कलिका ग्रंथ’ में इनके स्वरूप का वर्णन है।
पौराणिक कथा: श्री चक्रेश्वरी देवी का महाचमत्कारी ऐतिहासिक प्राचीन जैन भवन सरहिंद नगर में सिक्खों के ऐतिहासिक गुरुद्वारे ज्योति स्वरूप के समीप चंडीगढ़ चूनिया मार्ग पर गांव अत्तेवाली में स्थित है। जानकारीनुसार महाराज पृथ्वीराज चौहान के समय राजस्थान से एक छरीपालित यात्रा संघ हिमाचल प्रदेशांतर्गत कांगड़ा जैन तीर्थ की यात्रा पर जाते हुए सरहिंद की इस पावन भूमि पर रात्रि विश्राम के लिए रुका। यह संघ अपने साथ चक्रेश्वरी देवी की पिंडी भी लाया था। संघ रात्रि भक्ति में प्रभु ऋषभदेव तथा भगवती माता के मधुर गीतों में तल्लीन होकर मस्ती में झूम उठे। प्रातःकाल जब आगे के लिए संघ कूच करने लगा तो देवी माता वाली बैलगाड़ी टस से मस नहीं हुई। आकाश में एकदम प्रकाश हुआ और आकाशवाणी हुई - ‘मेरे भक्तो ! मुझे यही निवास दो। यह पुण्यभूमि मुझे अतिप्रिय है।’ भक्तों ने उस स्थान पर माता के भवन का निर्माण कराया। महाप्रभावी चमत्कारों के कारण यह स्थान महातीर्थ बन गया। उस समय वहां पीने के स्वच्छ पानी का भी अभाव था। संयोगवश भगवती की भक्ति में विभोर एक बालकन्या ने माता जी से स्वच्छ मीठे पानी के लिए प्रार्थना की तो क्षण मात्र में उस कन्या के पैरों के मध्य से स्वच्छ और मीठे जल का झरना फूट पड़ा। वही पवित्र झरना आज ‘अमृत कुंड’ के नाम से प्रसिद्ध है। श्रद्धालु भक्तजन अमृत कुंड के पवित्र जल को गंगाजल के समान ग्रहण कर अपने-अपने घर ले जाते हैं। माता जी के चमत्कारों की गाथाएं सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। सैकड़ों ऐतिहासिक, चमत्कारिक कथानक जैन आगमों में भरे पड़े हैं जिनमें चक्रेश्वरी देवी ने अपने भक्तों को अपमार्गों और कष्टों से छुटकारा दिलाने का उल्लेख है।
कहाँ ठहरे: तीर्थ परिसर में धर्मशाला व भोजनशाला आदि की सुचारू व्यवस्था है। अपने गौरवपूर्ण व स्वर्णिम इतिहास तथा श्रद्धा का व्यापक आधार होने के कारण माता चक्रेश्वरी देवी के इस स्थान को अखिल भारतीय जैन तीर्थ होने का गौरव प्राप्त है।
वार्षिक आयोजन: माता चक्रेश्वरी की वार्षिक यात्रा एवं पूजा महोत्सव दशहरे के बाद तीसरे दिन से आश्विन सुदि त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णमासी को मनाया जाता है। दिसंबर के महीने में मनाया जाने वाला शहीदी जोर मेला, फतेहगढ़ साहिब पर्यटन का एक अभिन्न भाग है।
और क्या देखें:
फतेहगढ़ साहिब: इसे युद्ध भूमि के रूप में भी जाना जाता है। इसी जगह गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों पुत्रों साहिबज़ादा फ़तेह सिंह और साहिबज़ादा जोरावर सिंह ने शहादत दी थी, क्योंकि उन्होंने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया था। इनके अंतिम सस्कार के लिए सरहिन्द के नवाब वज़ीर खान से अशर्फियों के बदले जमीन प्राप्त करके तीनों मृतक शरीरों का स्वयं अन्तिम संस्कार कराने वाले सामाना में जन्मे व माता चक्रेश्वरी देवी के उपासक ओसवाल गदिया गौत्रीय-दीवान टोडरमल जैन का नाम इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों में अंकित है।
टोडरमल हवेली: गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब के परिसर में स्थित इस हवेली या जहाज़ महल के नाम से मशहूर इस हवेली की प्रत्येक संरचना में वास्तुकला का अद्भुत प्रदर्शन है।
आम ख़ास बाग़: बादशाह बाबर द्वारा बनवाई गई एक सराय के अवशेष हैं जिसे बाद में शाहजहाँ ने पुनर्निर्माण किया क्योंकि कई शाही परिवार लाहौर जाते समय यहाँ रूकते थे। इस परिसर का एक वातानुकूलित तंत्र, जिसे सरद खाना कहा जाता है, ध्यान देने योग्य है।
फ्लोटिंग रेस्टॉरेंट: पानी पर तैरती हुई एक प्रभावशाली संरचना अपनी विभिन्नता के कारण बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
संघोल: संघोल अपने पुरातात्विक संग्रहालय के लिए प्रसिद्ध है जिसमें सिंधु घाटी व हड़प्पन सभ्यता के अवशेष और कलाकृतियां रखी गई हैं। इस संग्रहालय में 15,000 से भी अधिक कलाकृतियां और पहली एवं दूसरी शताब्दी में निर्मित बौद्ध स्तूप एवं मठ देख सकते हैं।
गुरुद्वारा शहीदगंज: यह गुरुद्वारा उन 6000 सिखों के अंतिम संस्कार की स्मृति में बनाया गया है जिन्होंने युद्ध के दौरान अपना बलिदान दिया था।
सधाना कसाई की मस्जिद: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा घोषित यह मस्जिद भगत सधाना को समर्पित है, जो एक मुस्लिम कवि, संत और फ़कीर थे। उनके कई भजन सिखों के पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित किये गए हैं।
संत नामदेव मंदिर: संत मानदेव महाराष्ट्र में रहते थे। सिखों की पवित्र पुस्तक गुरु ग्रन्थ साहिब में उनके 61 भजनों को सम्मिलित किया गया है।
कैसे पहुंचे: पर्यटक ट्रेन से सरहिंद रेलवे स्टेशन तक पहुँच सकते हैं, जो फतेहगढ़ साहिब से लगभग 5 किमी दूर है।
विशेष: जानकारी के मुताबिक चेन्नई से प्रकाशित वृहद् ग्रंथ ‘जैन तीर्थ दर्शन’ में भी माता श्री चक्रेश्वरी देवी जैन तीर्थ को सुविख्यात तीर्थों की श्रेणी में प्रमुख स्थान दिया गया है।
पौराणिक कथा: श्री चक्रेश्वरी देवी का महाचमत्कारी ऐतिहासिक प्राचीन जैन भवन सरहिंद नगर में सिक्खों के ऐतिहासिक गुरुद्वारे ज्योति स्वरूप के समीप चंडीगढ़ चूनिया मार्ग पर गांव अत्तेवाली में स्थित है। जानकारीनुसार महाराज पृथ्वीराज चौहान के समय राजस्थान से एक छरीपालित यात्रा संघ हिमाचल प्रदेशांतर्गत कांगड़ा जैन तीर्थ की यात्रा पर जाते हुए सरहिंद की इस पावन भूमि पर रात्रि विश्राम के लिए रुका। यह संघ अपने साथ चक्रेश्वरी देवी की पिंडी भी लाया था। संघ रात्रि भक्ति में प्रभु ऋषभदेव तथा भगवती माता के मधुर गीतों में तल्लीन होकर मस्ती में झूम उठे। प्रातःकाल जब आगे के लिए संघ कूच करने लगा तो देवी माता वाली बैलगाड़ी टस से मस नहीं हुई। आकाश में एकदम प्रकाश हुआ और आकाशवाणी हुई - ‘मेरे भक्तो ! मुझे यही निवास दो। यह पुण्यभूमि मुझे अतिप्रिय है।’ भक्तों ने उस स्थान पर माता के भवन का निर्माण कराया। महाप्रभावी चमत्कारों के कारण यह स्थान महातीर्थ बन गया। उस समय वहां पीने के स्वच्छ पानी का भी अभाव था। संयोगवश भगवती की भक्ति में विभोर एक बालकन्या ने माता जी से स्वच्छ मीठे पानी के लिए प्रार्थना की तो क्षण मात्र में उस कन्या के पैरों के मध्य से स्वच्छ और मीठे जल का झरना फूट पड़ा। वही पवित्र झरना आज ‘अमृत कुंड’ के नाम से प्रसिद्ध है। श्रद्धालु भक्तजन अमृत कुंड के पवित्र जल को गंगाजल के समान ग्रहण कर अपने-अपने घर ले जाते हैं। माता जी के चमत्कारों की गाथाएं सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। सैकड़ों ऐतिहासिक, चमत्कारिक कथानक जैन आगमों में भरे पड़े हैं जिनमें चक्रेश्वरी देवी ने अपने भक्तों को अपमार्गों और कष्टों से छुटकारा दिलाने का उल्लेख है।
कहाँ ठहरे: तीर्थ परिसर में धर्मशाला व भोजनशाला आदि की सुचारू व्यवस्था है। अपने गौरवपूर्ण व स्वर्णिम इतिहास तथा श्रद्धा का व्यापक आधार होने के कारण माता चक्रेश्वरी देवी के इस स्थान को अखिल भारतीय जैन तीर्थ होने का गौरव प्राप्त है।
वार्षिक आयोजन: माता चक्रेश्वरी की वार्षिक यात्रा एवं पूजा महोत्सव दशहरे के बाद तीसरे दिन से आश्विन सुदि त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णमासी को मनाया जाता है। दिसंबर के महीने में मनाया जाने वाला शहीदी जोर मेला, फतेहगढ़ साहिब पर्यटन का एक अभिन्न भाग है।
और क्या देखें:
फतेहगढ़ साहिब: इसे युद्ध भूमि के रूप में भी जाना जाता है। इसी जगह गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों पुत्रों साहिबज़ादा फ़तेह सिंह और साहिबज़ादा जोरावर सिंह ने शहादत दी थी, क्योंकि उन्होंने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया था। इनके अंतिम सस्कार के लिए सरहिन्द के नवाब वज़ीर खान से अशर्फियों के बदले जमीन प्राप्त करके तीनों मृतक शरीरों का स्वयं अन्तिम संस्कार कराने वाले सामाना में जन्मे व माता चक्रेश्वरी देवी के उपासक ओसवाल गदिया गौत्रीय-दीवान टोडरमल जैन का नाम इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों में अंकित है।
टोडरमल हवेली: गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब के परिसर में स्थित इस हवेली या जहाज़ महल के नाम से मशहूर इस हवेली की प्रत्येक संरचना में वास्तुकला का अद्भुत प्रदर्शन है।
आम ख़ास बाग़: बादशाह बाबर द्वारा बनवाई गई एक सराय के अवशेष हैं जिसे बाद में शाहजहाँ ने पुनर्निर्माण किया क्योंकि कई शाही परिवार लाहौर जाते समय यहाँ रूकते थे। इस परिसर का एक वातानुकूलित तंत्र, जिसे सरद खाना कहा जाता है, ध्यान देने योग्य है।
फ्लोटिंग रेस्टॉरेंट: पानी पर तैरती हुई एक प्रभावशाली संरचना अपनी विभिन्नता के कारण बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
संघोल: संघोल अपने पुरातात्विक संग्रहालय के लिए प्रसिद्ध है जिसमें सिंधु घाटी व हड़प्पन सभ्यता के अवशेष और कलाकृतियां रखी गई हैं। इस संग्रहालय में 15,000 से भी अधिक कलाकृतियां और पहली एवं दूसरी शताब्दी में निर्मित बौद्ध स्तूप एवं मठ देख सकते हैं।
गुरुद्वारा शहीदगंज: यह गुरुद्वारा उन 6000 सिखों के अंतिम संस्कार की स्मृति में बनाया गया है जिन्होंने युद्ध के दौरान अपना बलिदान दिया था।
सधाना कसाई की मस्जिद: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा घोषित यह मस्जिद भगत सधाना को समर्पित है, जो एक मुस्लिम कवि, संत और फ़कीर थे। उनके कई भजन सिखों के पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित किये गए हैं।
संत नामदेव मंदिर: संत मानदेव महाराष्ट्र में रहते थे। सिखों की पवित्र पुस्तक गुरु ग्रन्थ साहिब में उनके 61 भजनों को सम्मिलित किया गया है।
कैसे पहुंचे: पर्यटक ट्रेन से सरहिंद रेलवे स्टेशन तक पहुँच सकते हैं, जो फतेहगढ़ साहिब से लगभग 5 किमी दूर है।
विशेष: जानकारी के मुताबिक चेन्नई से प्रकाशित वृहद् ग्रंथ ‘जैन तीर्थ दर्शन’ में भी माता श्री चक्रेश्वरी देवी जैन तीर्थ को सुविख्यात तीर्थों की श्रेणी में प्रमुख स्थान दिया गया है।
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