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- श्रुतप्रभावक मुनीराजश्री वैभवरत्न विजयजी म.सा.

पर्युषण पर्व श्रुत रत्नाकर भावांजलि

"ज्ञान समो नहीं कोई"


जब तक ज्ञान प्राप्ति नहीं होगी तब तक भावों की प्रगति हांसिल नहीं हो पाएगी। इसीलिए तमाम धर्म क्रिया करते हुए ज्ञान प्राप्ति का लक्ष्य भी होना चाहिए। वस्तु के ज्ञान से उसके सही उपयोग का अंदाजा आ सकता है।

पर्युषण पर्व की इस ज्ञानमाला में पंचम कर्तव्य रूप मोती है - चैत्य परिपाटी

चैत्य - जहाँ विशुद्ध चेतना संचार होता है अर्थात जिनमंदिर। भविजीवो के लिए आत्मोन्नति का परम स्थान है जिनालय ऐसे जिनालयों के दर्शन करने हेतु चतुर्विध संघ सहित चैत्य परिपाटी का आयोजन करना चाहिए।
जो विश्वोपकारी है और जीवों को जिन्होने मोक्ष मार्ग बताया है ऐसे श्री तीर्थंकर परमात्मा के दर्शन मात्र से जीव को अभूतपूर्व शाता प्राप्त होती है। "जिणपडिमा जिन सारीख़ी" अर्थात जिनेश्वर परमात्मा की अनुपस्थिति में उनकी प्रतिमा उनके समान कही गई है। संघ सहित चैत्य जुहारने से भावो में भी अभिवृद्धि होती है और शासन प्रभावक कार्य भी होता है। विशिष्ट प्राचीन जिनालयों के दर्शन से संघ को भी हमारी प्राचीनता, भव्यता का ज्ञान होता है। पूर्व के महापुरुषों ने उत्तम भावो से जिनालयो की रचना-प्रतिष्ठा की है, उन भावों के दर्शन हमें जिनालय में होते है। इन भावों की प्राप्ति से जीवो को भी शासन के प्रति अहोभाव पैदा होता है और स्वकल्याण का मार्ग प्राप्त होता है। जिनप्रतिमा के दर्शन करने मात्र से अनार्य देश केआर्द्रकुमार ने मुक्तिमार्ग प्राप्त कर लिया था। उत्तम भक्ति करने द्वारा भवान्तर में हमें भी जिनेश्वर परमात्मा और जिनशासन का योग मिलता रहेगा। और संघ के साथ ऐसे दर्शन करने से अधिक पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए चैत्य परिपाटी का कर्तव्य भी पर्युषण पर्व में पूर्ण करना ही चाहिए।
इस प्रकार पाँच कर्तव्य पर्युषण पर्व के हुए। इन कर्तव्यों को अवश्य पूर्ण करना ही चाहिए। यह कर्तव्य आत्म शुद्धि के लिए करने है, मोक्ष मार्ग के लिए करने है। इन धर्मक्रियाओ के माध्यम से जीव पंचम गति के लिए प्रगति प्राप्त करता है और स्वात्मा की अनुभूति में आगे बढ़ता है।

पर्युषण के पाँच कर्तव्यों के साथ साथ श्रावक के वार्षिक 11 कर्तव्यों का वर्णन भी किया गया है।

१. संघ पूजा - संघ अर्थात साधु साध्वी श्रावक श्राविका

इनकी भक्ति करनी चाहिए। सिर्फ भक्ति करना भी पूजा नहीं है बल्कि संघ की प्रशंसा करना, गुणों को लोक में प्रगट करना आदि क्रिया वास्तविक संघ पूजा है। चतुर्विध संघ के सुकृतो को अनुमोदना करनी चाहिए। इन क्रियाओ से लोक में तो संघ की प्रभावना होती ही है बल्कि साथ में स्वात्मा की स्थिति भी अनुकूल बनती है, आत्मा विनय मार्ग में आगे बढ़ता है और परंपरा से मोक्ष मार्ग की प्राप्ति करता है।

२. साधर्मिक भक्ति -

पॉंच कर्तव्यों में अनुसार समान धर्मी व्यक्ति की सेवा-भक्ति करनी चाहिए। यह भक्ति ऐसे हो जिससे साधर्मिक व्यक्ति का सम्मान बरक़रार रहे। उन्हें आवश्यक वस्तुए की उपलब्धता करवाना श्रावक का कर्तव्य है।

३. यात्रात्रिक - तीन प्रकार की यात्रा होती है।

प्रथम है श्रुतयात्रा - पर्युषण पर्व में अष्टान्हिका ग्रन्थ की सुंदर भावो से महोत्सवपूर्वक यात्रा करवानी चाहिए। श्री वीतराग परमात्मा की वाणी श्रुतज्ञान स्वरुप विध्यमान है। चतुर्विध संघ सहित इसकी यात्रा करवाने से ज्ञान का महत्व तमाम जीवो को दिखेगा और शासन प्रभावना होगी।

द्वितीय है रथयात्रा - जिनका शासन विध्यमान है वह त्रैलोक्यनाथ श्री महावीर स्वामीजी की प्रतिमा को रथ में रखकर नगर में परमात्मा की जाजरमान रथयात्रा की जाती है। अरिहंत परमात्मा का भव्य स्वरुप जीवो को देखने मिले इस प्रकार प्रभावशाली रथयात्रा से जीवो को अनुमोदना का लाभ मिलता है और ऐसे प्रभावक कार्यो से कई जीव समकित भी प्राप्त कर सकते है।

तृतीय है तीर्थयात्रा - तीर्थ दो प्रकार के है जंगम और स्थावर

जंगम तीर्थ - पूज्य गुरु भगवंत। वर्ष में एक बार चतुर्विध संघ समते पूज्य गुरु भगवंत के दर्शन वंदन हेतु अवश्य जाना चाहिए। जिससे जीवो को गुरु का सान्निध्य प्राप्त हो और मोक्ष मार्ग में प्रगति हेतु हितशिक्षा प्राप्त हो। "गुरु विन घोर अन्धकार" - गुरु के बिना संसार पार करना मुमकिन नहीं है। इसलिए अवश्य गुरुदेव के दर्शन करने चाहिए।

स्थावर तीर्थ - "तारे ते तीर्थ" प्राचीन अर्वाचीन तीर्थयात्रा अवश्य करनी ही चाहिए। संघ सहित ऐसे तीर्थो की यात्रा करने से पुण्यानुबंधी पुण्य उपार्जित होता है। समतारस से भरपूर सुंदर प्राचीन प्रतिमाजी के दर्शन-वंदन से भी अनेक कर्म टूट जाते है। सुंदर महोत्सवपूर्वक ऐसे प्राचीन तीर्थो के दर्शन हेतु जाना ही चाहिए।

४. स्नात्र महोत्सव - सामूहिक स्वरुप से स्नात्र पूजा करनी चाहिए। वार्षिक कर्तव्य है किन्तु हर महीने या हर 7 दिन में एक बार स्नात्र महोत्सव अवश्य करना चाहिए। सुंदर भक्ति और स्तवनावली के माध्यम से जीव इतने भावो में डूब जाता है की अनेक कर्मो को तोड़ दे। प्रभु भक्ति में ज़्यादा से ज़्यादा भाव प्राप्त करने से कर्म अवश्य टूटेंगे।

५. देवद्रव्य वृद्धि - जिनालय में यथाशक्ति द्रव्य रखना चाहिए। संघ की विशेष योजनाओ में भी यथाशक्ति लाभ लेना चाहिए। देवद्रव्य वृद्धि से जिनालय की व्यवस्था सुआयोजित स्वरुप से जारी रहेगी। साथ ही अवश्य ध्यान रखे की देवद्रव्य में जो चढ़ावे लिए जाते है वह राशि तुरंत ही देवद्रव्य में जमा कर देनी चाहिए। ऐसे कई श्रावक के इतिहास पाए जाते है जहाँ चढ़ावे बोलने के बाद जब तक राशि जमा ना करवाई जाए तब तक आहार-पानी का त्याग लिया जाता है। साथ ही, देवद्रव्य का भक्षण ना हो, देवद्रव्य को हानि ना पहुंचे इस बात का ध्यान भी अवश्य रखना ही चाहिए।


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