कुछ दातार परिवार की ओर से उनके खास दिन पर आश्रम में अन्धजनों को भोजन परोसने के पश्चात अपने अधूरे विचारों का ताना-बाना बुनते हुए मैं चली जा रही थी| अधूरे विचार इसलिए क्योंकि अच्छा लगता है, किसी की ख़ुशी में सम्मिलित होना और बुरा लगता है कि भगवान की बनाई इस दुनिया में लोग दुखी होते ही क्यों हैं? तभी एक मासूम मुझसे कुछ मिलने की नियत से मेरे पास आई और मुझसे दो दिनों से भूखे रहने की दुहाई देते हुए पैसों की मांग करने लगी| अब इसे उसूल कहें, कंजूसी कहे या कुछ और.... मैंने कहा मेरे पास पैसे तो नहीं हैं लेकिन यदि भूखी है तो मेरे साथ चल, मैं तुझे खाना खिला सकती हूँ| पहले तो उसने ना-नुकर की लेकिन कुछ सोचकर वह मेरे साथ हो ली| हम दोनों आमने-सामने बैठे थे| वह खाए जा रही थी और मैं विचारों में डूबी थी कि बेटी बचाओ-बेटी पढाओं का नारा देने वाले देश में जो बेटी खाने को मोहताज है... वह कहाँ कोई सपना देख पायेगी? अगर इन भिखारियों के लिए कुछ किया जाये... मेरे विचारों को अचानक विराम लग गया, जब उस मासूम ने मुझसे सवाल किया कि दीदी, सब लोग रोज इतनी सारी मोमबत्तियाँ क्यों जला रहे हैं? क्या फिर से कोई दामिनी और गुड़ियाँ जैसा हुआ है? ओह! मुझे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था| मेरा मन समझ नहीं पा रहा था कि इस बच्ची को कौन सा उदाहरण देकर समझाऊं कि किसके साथ, किसने, क्या किया था और कितनों ने किया था? क्योंकि मैं मानसिक रूप से इतनी दृढ़ नहीं हूँ कि सोच भी सकूं कि ये सब क्या हो रहा है? मुझसे वो हिम्मत नहीं है कि निर्भया-दामिनी-गुड़ियाँ की पीड़ा को शब्दों में ढाल संकू? चिलचिलाती धुप में बारिश की कल्पनाओं की दिखावटी दुनिया में रहना और हकीकत की कठोर धरातल पर चलना बिलकुल जुदा है| इस घटना के दोषी दरिंदे के प्रति मेरे मन में भी बहुत क्रोध है किन्तु इस मासूम की जिज्ञासा मुझे भीतर तक झकझोर रही थी| उसका खाना पूरा होने के बाद हम दोनों अपने-अपने रास्ते हो गये| मैंने उसे कुछ नहीं दिया (जवाब भी नहीं) लेकिन वो मुझे एक सवाल देकर चली गई| ऐसे में एक गाने की पंक्तियाँ याद आई...
हमसे क्या पूछते हो दर्द कहाँ होता है, आपका तीर बता देगा जहाँ होता है...
आज समाज का एक वर्ग है, जिसे एक वक्त का भोजन मिलना भी नसीब नहीं तो वहीं दूसरा वर्ग है, जिसके पास भोजन तो है पर खाने का वक्त नहीं| एक के पास समय है पर परिवार नहीं और दूसरी ओर परिवार है पर उनके पास अपने परिवार के लिए समय नही| यानि कहीं ना कहीं किसी तालमेल और संतुलन की कमी है| हमारे देश में ज्यादातर समस्याओं का मूल कारण शिक्षा का अभाव है| उस पर आरक्षण की मार ने होनहार युवा पीढ़ी की रीढ़ की हड्डी ही तोड़ दी है| हम बड़ी-बड़ी तकनीकी, मैनेजमेंट, संस्थाओं की बात करके आसमान मुठ्ठी में करने की बात कर रहे हैं लेकिन सच तो यह है कि हमारे पैरों नीचे की जमीन कब खिसक जाये, कोई नहीं जानता| वर्तमान समय कि मांग है कि झुग्गी-झोपडी के अवयस्क बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ना करते हुए उन्हें घरों में नौकर ना बनायें और सड़क किनारे भीख मांगते बच्चों को भी शिक्षा का महत्त्व बताने का प्रयास करें| सभी बच्चों को मान-मर्यादा का पाठ हमें ही पढाना होगा और उनके मन की बात अपने दिल से सुननी होगी| मां को अपने बच्चों के हर सवाल का जवाब देते हुए उनको यौन शिक्षा भी देनी ही होगी क्योंकि अगर आप नहीं बतायेंगी तो आपका बच्चा अपने सवालों के जवाब खुद जानने का प्रयास करेगा| सरकार तो यह पहल नहीं कर सकती क्योंकि वोट बैंक हाथों से खिसकने का डर हो सकता है या करेगी तो मात्र कागजी कार्यवाही होगी| सरकार बहुत कुछ कर रही है, बाकि हमारी नैतिक जिम्मेदारी को हमें ही निभाना होगा| अपने अहम के वहम को बढ़ावा ना देते हुए सभ्य समाज की सभ्यता को पुनर्जीवित करना ही होगा और यह कार्य लेख लिखने अथवा मोमबत्तियां जलने से नहीं होगा...
हमसे क्या पूछते हो दर्द कहाँ होता है, आपका तीर बता देगा जहाँ होता है...
आज समाज का एक वर्ग है, जिसे एक वक्त का भोजन मिलना भी नसीब नहीं तो वहीं दूसरा वर्ग है, जिसके पास भोजन तो है पर खाने का वक्त नहीं| एक के पास समय है पर परिवार नहीं और दूसरी ओर परिवार है पर उनके पास अपने परिवार के लिए समय नही| यानि कहीं ना कहीं किसी तालमेल और संतुलन की कमी है| हमारे देश में ज्यादातर समस्याओं का मूल कारण शिक्षा का अभाव है| उस पर आरक्षण की मार ने होनहार युवा पीढ़ी की रीढ़ की हड्डी ही तोड़ दी है| हम बड़ी-बड़ी तकनीकी, मैनेजमेंट, संस्थाओं की बात करके आसमान मुठ्ठी में करने की बात कर रहे हैं लेकिन सच तो यह है कि हमारे पैरों नीचे की जमीन कब खिसक जाये, कोई नहीं जानता| वर्तमान समय कि मांग है कि झुग्गी-झोपडी के अवयस्क बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ना करते हुए उन्हें घरों में नौकर ना बनायें और सड़क किनारे भीख मांगते बच्चों को भी शिक्षा का महत्त्व बताने का प्रयास करें| सभी बच्चों को मान-मर्यादा का पाठ हमें ही पढाना होगा और उनके मन की बात अपने दिल से सुननी होगी| मां को अपने बच्चों के हर सवाल का जवाब देते हुए उनको यौन शिक्षा भी देनी ही होगी क्योंकि अगर आप नहीं बतायेंगी तो आपका बच्चा अपने सवालों के जवाब खुद जानने का प्रयास करेगा| सरकार तो यह पहल नहीं कर सकती क्योंकि वोट बैंक हाथों से खिसकने का डर हो सकता है या करेगी तो मात्र कागजी कार्यवाही होगी| सरकार बहुत कुछ कर रही है, बाकि हमारी नैतिक जिम्मेदारी को हमें ही निभाना होगा| अपने अहम के वहम को बढ़ावा ना देते हुए सभ्य समाज की सभ्यता को पुनर्जीवित करना ही होगा और यह कार्य लेख लिखने अथवा मोमबत्तियां जलने से नहीं होगा...

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