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मुंबई/ गोडवाड ज्योती: विख्यात लेखक एवं चिंतक श्री जे. के. संघवीजी (आहोर-ठाणे) अपना जीवित महोत्सव आयोजित करने के लिये पूज्य आचार्यश्री जयंतसेन सूरीश्वरजी म.सा. से चर्चा के लिये पहुंचे| तब गुरुदेव ने कहा कि जब भी नक्की करो तो हम आ जाएंगे। बाद में उन्हें ये प्रश्न हुआ कि जीवित महोत्सव का असली मकसद क्या है? सीधा-साधा तो मतलब यही है कि इस भव का वैर द्वेष अगले भव साथ नहीं ले जाना चाहिये। इसे मृत्यु महोत्सव भी कहते है। हर प्राणी मात्र से माफी मांगना और वो हमें हँसी-खुशी माफ करे, इसके लिये हम स्वामी वात्सल्य, पूजा, भक्ति आदि का आयोजन करके सब रिश्तेदारों को बुलाते है, मगर आज के व्यस्त समय में कई लोग आते ही नहीं है तो फिर हमारा मकसद पूरा नहीं हो पाता है। गुरुदेव को मन की यह सब बात बताई। तब गुरुदेव ने कहा, ‘बात तो सही है, मगर आपने क्या सोचा है, वो बताओ। तब उन्होंने कहा, ‘मैं चिंतन करके आप को बताता हूँ| घर पर भी रोज यही चर्चा होती कि सबको मिले बिना कार्य पूरा नहीं होगा। तत्पश्चात घर पर सबकी सहमती से यह निर्णय हुआ कि हर गाँव में जाकर अपने जानने वालों से एवं जिनके साथ हमारी कभी बोल-चाल हुई हो या जिनके साथ हमने कषाय किया हो और जिनका हमने जाने-अनजाने में दिल दुखाया हो, उनको मिच्छामि दुक्कडम करना। तो इसी विचार को मूर्त रूप देने हेतु उन्होंने उत्कृष्ट पूजन, सामायिक के उपकरण व साहित्य आदि सामग्री सभी के यहां व्यक्तिगत रूप से जाकर क्षमा मांगते हुए अर्पण करने की योजना बनाई। समस्त भारत में १५०० परिवारों से रूबरू मिलने का उनका लक्ष्य है और उसी संदर्भ में वे अलग-अलग शहरों और नगरों में जा रहे हैं। इनके इस महान कार्य से एक तरफ तो पैसे का सही सदुपयोग हो रहा है और मिच्छामि-दुक्कडम का इनका मकसद भी पूरा हो रहा है और समाज में भी इस अनूठे कार्य की शुभ शुरुआत हो रही है, जिससे आने वाली पीढ़ी प्रेरणा लेकर ऐसे ही क्रांतिकारी कार्य करेगी, जो समाज के लिए हितकारी होंगे। हम उनके इस अनुकरणीय, अनुमोदनीय एवं अभिनंदनीय कार्य की दिल की गहराईयों से अनुमोदना एवं अभिनंदन करते हैं।

ज्ञात हो कि श्री संघवीजी के परिवार ने पूर्व में छःरी पालित संघ का आयोजन किया है और ठाणे के निकट मानपाडा में इन्होंने जिनालय का निर्माण कराया है। श्री जे के संघवीजी त्रिस्तुतिक संघ के मुखपत्र ‘शाश्वत धर्म’ के कई वर्षों तक मानद संपादक भी रह चुके हैं। सम्पूर्ण परिवार धर्ममय है और इनके पोते श्री आदि संघवी की दीक्षा इनके परिवार के सद्कार्यों में यश कलगी के रूप में शोभायमान है। श्री संघवीजी ने कई जीवनोपयोगी पुस्तकों का सम्पादन और प्रकाशन भी किया है और उनकी लेखनी से निरंतर सदविचारों का प्रवाह चालू है।

प्रकाश मोहनलालजी बंदा, चैन्नई-आहोर

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