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त्रिसूर केरल की सांस्कृतिक राजधानी कहलाता है। त्रिसूर का नाम मलयालम शब्द त्रिस्सिवपेरुर से निकला है जिसका अर्थ होता है शिव का पवित्र घर। प्राचीन काल में इसे वृषभद्रीपुरम और तेन कैलाशम कहा जाता था। त्रिसूर जिले ने दक्षिण भारत के राजनैतिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इस जिले का प्रारंभिक राजनैतिक इतिहास संगम काल के चेर वंश से जुड़ा हुआ है जिन्होंने केरल के बड़े हिस्से पर शासन किया था। त्रिसूर की सांस्कृतिक परंपराएं काफी पुरानी हैं। प्राचीन काल से ही यह अध्ययन और संस्कृति का केंद्र रहा है। केरल का सबसे रंगबिरंगा मंदिर उत्सव त्रिसूर पूरम राज्य और राज्य के बाहर के लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां के चर्च, मंदिर, समुद्री तट आदि सभी कुछ पर्यटकों को लुभाते हैं।

क्या देखें:
द बेसिलिका ऑफ आवर लेडी ऑफ डलर्स: 25000 वर्ग फीट में फैले इस चर्च का निर्माण 1940 में कोचीन के महाराजा राम वर्मा की सहायता से किया गया था। चर्च की दो इमारतें सामने की ओर और एक इमारत पीछे की तरफ है जिसे बाइबल टावर कहा जाता है। ये सभी इमारतें गोथिक शैली में बनी हुई हैं। चर्च में जर्मनी से मंगाई गई आठ संगीतमय घंटियां हैं जिनसे संगीत के सात सुर सुनाई देते हैं। यहां की सेप्टिक-सेल मॉडल सिमेटरी भारत में अपनी तरह का सबसे बड़ा कब्रिस्तान है।

पलयुर चर्च: इसका निर्माण सेंट थॉमस ने करवाया था। चर्च के प्रवेश द्वार पर ग्रेनाइट से बनी 14 प्रतिमाएं रखी गई हैं जो सेंट थॉमस के जीवन का दर्शाती हैं। मुख्य कक्ष के सामने बने जुबिली द्वार पर बाइबल की घटनाओं को बर्मी टीक पर खुदे हुए देखा जा सकता है। पास ही ऐतिहासिक संग्रहालय, बोट जेट्टी और तलियाकुलम हैं।

पेरिंगलकतु बांध: चलक्कुडी नदी पर बना यह बांध वलपरई जाने वाले मार्ग पर घने जंगल में स्थित है। 290।25 मीटर लंबे इस बांध से चलक्कुडी नदी की सहायक नदी कन्नमकुजिताडु को पानी दिया जाता है। इस बांध को करीब से देखने के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है। यहां से 8 किमी की दूरी पर एक खूबसूरत स्थान है जहां तीन नदियों- कुरियरकुट्टी, करपरा और परंबिकुलम का संगम होता है।

रामन जुमा मस्जिद: कोडंगलूर तालुक के मेथला गांव में स्थित रामन जुमा मस्जिद भारत की पहली जुमा मस्जिद है। इस मंदिर का आकार और निर्माण हिंदुओं ने हिंदू कला और वास्तुशिल्प के आधार पर किया था। मस्जिद के साथ तीन महान अनुयायियों की कब्रें हैं जो भारत की पहली और विश्व की दूसरी ऐसी जगह है जहां जुमा नमाज शुरु हुई थी।

पुनरजननी: पुनरजननी एक प्राचीन गुफा है जो तिरुविलवमल मंदिर से तीन किमी की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि इस गुफा का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने परशुराम के आदेश पर किया था। भक्तों का विश्वास है कि पुनरजननी को पार कर लेने पर मोक्ष प्राप्त होता है। यूं तो पूरे वर्ष ही यहां भक्तों का तांता लगा रहता है फिर भी नवंबर-दिसंबर में गुरुवयूर एकादशी के दिन यहां हजारों की संख्या में लोग आते हैं लेकिन गुफा का रास्ता आसान नही है। कई स्थान तो ऐसे हैं जहां वायु की कमी है और कभी-कभी दम घुटने लगता है।

गुरुवयूर श्री कृष्ण मंदिर:
भगवान श्री कृष्ण को समर्पित गुरुवायूरप्पन मंदिर दक्षिण भारत का द्वारका कहलाता है। मंदिर में स्थापित भगवान की मुद्रा वैकुंठधाम के समकक्ष है और इसलिए इस मंदिर को भूलोक वैकुंठ कहा जाता है। यहां एक पवित्र सरोवर है जिसे रुद्रतीर्थ कहा जाता है। तुलाभरम यहां का महत्वपूर्ण प्रसाद है जिसमें केले, चीनी, नारियल और सिक्के चढ़ाए जाते हैं। फरवरी-मार्च में 10 दिनों का उत्सव मनाया जाता है जिसमें हाथी-दौड़ का आयोजन होता है। यह मंदिर विवाह समारोह और अन्नप्रसनम के आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है|

वदक्कुनाथन मंदिर: त्रिसूर के वदक्कुनाथन मंदिर का निर्माण केरल शैली में किया गया है। मुख्य मंदिर में और कूथंबलम में लकड़ी पर की गई खूबसूरत नक्काशी देखी जा सकती है। हर साल अप्रैल और मई के दौरान मंदिर परिसर में त्रिसूर पूरम का आयोजन किया जाता है।

त्रिसूर चिड़ियाघर: कला और पुरातत्व संग्रहालय के पास स्थित करीब एक शताब्दी पुराना यह चिड़ियाघर लुप्तप्राय और संकटग्रस्त जीव-जंतुओं को संरक्षण प्रदान करता है। यहां पर एशियाई शेरों, बाघों और शेर जैसे पूछ वाले दुर्लभ बंदरों को देखा जा सकता है। यहां के सरीसृप गृह में किंग कोबरा, नाग और करैत को करीब से देखने का मौका मिलता है।

चूलनूर मोर अभ्यारण्य: पलक्कड़ और त्रिसूर जिलों में फैला यह मोर अभ्यारण्य केरल में अपनी तरह का एकमात्र अभ्यारण्य है। 300 हैक्टेयर में फैले इस अभ्यारण्य में सैंकडों मोर के अलावा अन्य प्रकार के पक्षी भी पाए जाते हैं। मानसून के फौरन बाद यहां सैकड़ों की संख्या में तितलियां देखी जा सकती हैं। महान मलयालम कवि कुंचन नांबियार के नाम पर कुंचन स्मृतिवनम, इस अभ्यारण्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नट्टिका बीच: त्रिसूर से 30 किमी दूर स्थित नट्टिका बीच सुनहरी रेत और खजूर के पेड़ों से सजा शांत बीच है। यहां के मुख्य आकर्षणों में बैकवॉटर क्रूज, हाथी की सवारी, गहरे समुद्र में मछली पकड़ना, समुद्र के किनार वॉलीबॉल, बैडमिंटन आदि खेल शामिल हैं।





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