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एक धार्मिक स्थल, सदियों पुरानी इमारत जिसे दुनियाभर से लोग देखने आते हैं। उसके दीदार के बाद क्या होता है, उनका आप अंदाजा नही सकते। चौंधिया जाती है उनकी आंखें। वो बार-बार यही सोचने पर मजबूर हो जाते हैं आखिर अब तक कहां छिपा था ये नायाब नमूना। दिल को छू जाने वाली इस इमारत को तभी तो लोग कहते हैं दिलवाड़ा का अजूबा......
दिलवाड़ा मंदिर जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्ध मंदिर है| दिलवाड़ा जैन मंदिर राजस्थान राज्य के सिरोही ज़िले के माउंट आबू में स्थित है। दिलवाड़ा मंदिर वस्तुतः पांच मंदिरों का समूह है। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच में हुआ था। मंदिर का एक-एक हिस्सा ऐसा तराशा हुआ है जैसे अभी बोल उठेगा। कलाकृति और शिल्प का ये बेजोड़ नमूना। मंदिर की दीवारें, खंभे सबकुछ देखकर आंखें ठहर जाती है। इस मंदिर का कोई भी ऐसा कोना नही है जो शिल्प से नहलाया नही गया हो। मंदिर की एक-एक दीवारें आज भी अपनी कहानी कहती हैं| ये वो मंदिर है जिसे देखने के लिए देश ही नही सात समंदर पार से भी लोग आते हैं। दिलवाड़ा का ये मंदिर 48 खंभों पर टिका हुआ है।

इतिहास: दिलवाड़ा जैन मंदिर 11वीं से 13वीं शताब्दी के दौरान चालुक्य राजाओं वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाईयों द्वारा 1231 ई. में बनवाया गया था। जैन वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण-स्वरूप दो प्रसिद्ध संगमरमर के बने मंदिर जो दिलवाड़ा या देवलवाड़ा मंदिर कहलाते हैं, इस पर्वतीय नगर के जगत प्रसिद्ध स्मारक हैं। विमलसाह ने पहले कुंभेरिया में पार्श्वनाथ के 360 मंदिर बनवाए थे किंतु उनकी इष्टदेवी अंबाजी ने किसी बात पर रुष्ट होकर पाँच मंदिरों को छोड़ अवशिष्ट सारे मंदिर नष्ट कर दिए और स्वप्न में उन्हें दिलवाड़ा में आदिनाथ का मंदिर बनाने का आदेश दिया किंतु आबूपर्वत के परमार नरेश ने विमलसाह को मंदिर के लिए भूमि देना तभी स्वीकार किया जब उन्होंने संपूर्ण भूमि को रजतखंडों से ढक दिया। इस प्रकार 56 लाख रूपये में यह ज़मीन ख़रीदी गई थी।

स्थापत्य कला: इस मंदिर में स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने है। इन पाँच मंदिरों की अद्भुत कारीगरी देखने योग्य है। अपने ऐतिहासिक महत्त्व और संगमरमर पत्थर पर बारीक नक़्क़ाशी की जादूगरी के लिए विश्वविख्यात मंदिरों में शिल्प-सौंदर्य का ऐसा बेजोड़ ख़ज़ाना है, जिसे दुनिया में अन्यत्र और कही नही देखा जा सकता। इस मंदिर में आदिनाथ की मूर्ति की आंखें असली हीरक की बनी हुई हैं और उसके गले में बहुमूल्य रत्नों का हार है। फूल-पत्तियों व अन्य मोहक डिजाइनों से अलंकृत, नक़्क़ाशीदार छतें, पशु-पक्षियों की शानदार संगमरमरीय आकृतियां, सफ़ेद स्तंभों पर बारीकी से उकेरकर बनाई सुंदर बेलें, जालीदार नक़्क़ाशी से सजे तोरण और इन सबसे बढ़कर जैन तीर्थकरों की प्रतिमाएं।

प्रवेश द्वार: दिलवाड़ा जैन मंदिर का प्रवेशद्वार गुंबद वाले मंडप से होकर है, जिसके सामने एक वर्गाकृति भवन है। इसमें छ: स्तंभ और दस हाथियों की प्रतिमाएं हैं। इसके पीछे मध्य में मुख्य पूजागृह है, जिसमें एक प्रकोष्ठ में ध्यानमुद्रा में अवस्थित जिन प्रतिमा स्थापित है।

मंदिर: यहाँ के पांच मंदिरों में दो विशाल मंदिर है तथा तीन उसके अनुपूरक है। यहाँ पर विमलवसही मंदिर प्रथम तीर्थंकर को समर्पित सबसे प्राचीन है, बाइसवें तीर्थंकर नेमीनाथ को समर्पित लुणवसही मंदिर भी बहुत दर्शनीय है। भगवान कुंथुनाथ का दिगम्बर जैन मंदिर भी स्थापित है। यहाँ एक अदभुत देवरानी जेठानी का मंदिर भी है, जिसमें भगवान आदिनाथ एवं शान्तिनाथजी की मूर्तियां स्थापित है। यहाँ के मंदिर परिसर में खरतरसाही, पीतलहर और भगवान महावीर का मंदिर भी स्थित है। यहां के पांच मंदिरों के समूह में विमलवसही सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे 1031ई. में तैयार किया गया। 1231 में वस्तुपाल और तेजपाल दो भाईयों ने इसका निर्माण करवाया था। उस वक्त इस मंदिर को तैयार करने में 1500 कारीगरों और 14 साल बाद इस मंदिर को ये खूबसूरती देने में कामयाबी हासिल हुई थी।

कथा: पौराणिक कथानुसार भगवान विष्णु ने बालमरसिया के रूप में अवतार लिय़ा। कहा जाता है कि भगवान विष्णु का ये अवतार गुजरात के पाटन में एक साधारण परिवार के घर में हुआ। विष्णु भगवान के जन्म के बाद ही पाटन के महाराजा उनके मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने माउंट आबू में इस मंदिर के निमार्ण की चाहत जाहिर की। ये बात पूरे राज्य में आग की तरह फैल गई। भगवान विष्णु के नये अवतार बालमरसिया ने भी महाराज के इस बात को सुना और वो वस्तुपाल और तेजपाल के पास इस मंदिर की रुपरेखा लेकर पहुंच गए। तब वस्तुपाल ने कहा कि अगर ऐसा मंदिर तैयार हो गया तब वो अपनी पुत्री की शादी बालमरसिया से कर देंगे। भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने इस प्रस्ताव को हाथों हाथ लिया। मंदिर को ऐसा बनाया की देखने वालों की आंखें चौधिया गई। पौराणिक कथा के अनुसार बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने छल किया और शादी करने के लिए एक और शर्त रख दी। उन्होंने शर्त रखी कि अगर एक रात में सूरज निकलने से पहले अपने नाखूनों से खुदाई कर मैदान को झील में तब्दील कर देंगे तब वो अपनी पोती का हाथ बालमरसिया के हाथों में देंगी। जाहिर है बालमरसिया अवतार थे और उनके लिए ये कोई मुश्किल काम नही था। उन्होने ऐसा कर दिखाया। फिर भी दादी ने अपनी पोती का विवाह उनसे नही किया। इस बात से भगवान विष्णु कोध्रित हो उठे और उन्होंने उसका वध कर दिया| दादीसास ने मरते-मरते दोनों को पत्थर में परिवर्तित होने का अभिशाप दिया। बाद में ये जगह गवाह बनी बालमरसिया के आजीवन अविवाहित रहने के रुप मे मशहूर हो गई। इस टीले पर पत्थर मारने की मान्यता है।

कुल मिलाकर अगर देखा जाये तो दिलवाड़ा मंदिर की आंतरिक बनावट और नक्काशी के मामले में राणकपुर मंदिर से किसी भी दृष्टी में कम सुंदर नही है किन्तु चित्र खींचने की पाबंधी होने की वजह से कोने-कोने में बिखरी इसकी खूबसूरती आम जनमानस तक नही पहुंच पाई है|

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