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आधुनिक राजस्थान के मध्य में स्थित अजमेर नगर की स्थापना १२वीं शताब्दी में चौहान शासक अजयदेव ने की
थी। यहाँ के मुख्य स्मारकों में  कुतुबद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित ढ़ाई   दिन का झौपड़ा, सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह, अजयराज द्वारा निर्मित तारागढ़ दुर्ग, अकबर द्वारा बनवाया गया किला (मैग्जीन) सहित सोनीजी की नसियाँ (जैन मन्दिर, जिस पर सोने का काम किया हुआ है) आदि प्रमुख स्मारक हैं। साथ ही चौहान शासक अर्णोराज (आनाजी) द्वारा निर्मित आनासागर झील है। इस झील के किनारे पर जहाँगीर ने दौलतबाग (सुभाष उद्यान) और शाहजहाँ ने बारहदरी का निर्माण करवाया था। जहाँ ख्वाजा साहिब की दरगाह साम्प्रदायिक सद्भाव का जीवंत नमूना है वहीँ मैग्नीज फोर्ट वर्तमान में संग्रहालय के रूप में मौजूद है। राजस्थान राज्य के अजमेर में स्थित जैन मंदिर सोनीजी की नसियाँ के नाम से प्रसिद्ध है। १८६४- १८९५ ईस्वी में करोली के लाल पत्थरों से बना यह खुबसुरत दिगम्बर मंदिर जैन तीर्थंकर आदिनाथ भगवान का है। लाल पत्थरों से बना होने के
कारण यह मंदिर ‘लाल मंदिर’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह रणकपुर और माउंट आबू के पश्चात राजस्थान के उत्कृष्ट जैन मंदिरों में से एक है। यह मंदिर प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान को समर्पित है। द्विमंजिल संरचना के इस मंदिर की दूसरी मंजिल पर एक बड़ा हॉल है जिसमें जैन धर्म व दर्शन को अभिव्यक्त करती हुई कृतियां उपलब्ध है। यहाँ इस मंदिर से संलग्न एक सुंदर म्यूजियम भी है। इस मंदिर के प्रथम तल को स्वर्ण नगरी हॉल' कहा जाता है।इस स्वर्ण नगरी मेंजैन धर्म से सम्बंधित पौराणिक दृश्य, अयोध्या नगरी, प्रयागराज के दृश्य, सोने से बनाई गई प्रतीकृतियां सुसज्जित है। एक अनुमान है कि
इनके निर्माण में तकरीबन १००० किलो सोना उपयोग में लिया गया है। यह स्वर्ण नगरी अपनी बारीक कारीगिरी और सुंदर पिच्चाकार नक्काशी के लिये प्रसिद्ध है। अहिंसा परमो धर्म एवं सबकी श्रद्धा के प्रतीक भगवान ऋषभदेव मंदिर का निर्माण रायबहादुर सेठ मूलचन्द नेमीचन्द सोनी ने राजस्थान के हृदय अजमेर नगर में करवाया था। कहा जाता है कि यह कार्य विद्वान् पं. सदासुखदासजी की देख-रेख में सम्पन्न हुआ था। इस मंदिर का नाम श्री सिद्धकूट चैत्यालय भी है। करौली के लाल पत्थर से निर्मित होने के कारण इसे लाल मंदिर तथा निर्माताओं के नाम से सम्बन्धित होने से सोनीजीकी नसियाँ या सोनी मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर में अयोध्यानगरी, सुमेरु पर्वत आदि की जो रचना है, वह सोने से मढ़ी हुई है। भवन में अत्यंत  आकर्षक चित्रकारी
है, जो लोक तथा संसार में जीव की अवस्था का  दिग्दर्शन कराती है। इस ऐतिहासिक मंदिर में प्रवेश करते ही अत्यन्त कलात्मक ८२फुट ऊँचे मानस्तम्भ के दिव्यदर्शन होते हैं। प्रतिमा स्थापन के ५ वर्ष पश्चातसेठ मूलचन्द सोनी की भावना हुई कि भगवान ऋषभदेव के पाँच कल्याणकों का मूर्त रूप में दृश्यांकन किया जाये। तदनुसार अयोध्यानगरी, सुमेरु पर्वत आदि की रचना का निर्माण कार्य जयपुर में हुआ और इसके बनने में २५ वर्ष लगे|समस्त रचना आदिपुराण के आधार पर बनायी गयी तथा सोने के वर्को से ढकी हुई है। कार्य पूरा होने पर सन १८६५ में जयपुर के संग्रहालय में इस अकल्पनीय रचना के प्रदर्शन के लिए १० दिन तक विशाल मेला लगा रहा, जिसमे तत्कालीन जयपुर नरेश महाराजा माधोसिंहजी इसमें स्वयं पधारे थे। इस रचना को मंदिर के पीछे निर्मित विशाल भवन में सन१८६५में स्थापित किया गया। भवन के अंदर का भाग सुंदर रंगों, अनुपम चित्रकारी एवं काँच की कला से सज्जित है।

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