जसवंत सिंह चले गए। वर्तमान राजनीति के सबसे बुद्धिजीवी और प्रखर राजनेता थे। अटलजी की सरकार में वित्त, विदेश और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय इस भूतपूर्व सैनिक ने कोई यूं ही नहीं संभाल लिए थे। लेकिन राजनीति का दुर्भाग्य देखिए कि बीजेपी की स्थापना में जिनकी अहम भूमिका रही, जीवन भर बीजेपी में जिन्होंने औरों की उम्मीदवारियां निर्धारित की, उसी बीजेपी में 2014 की मोदी लहर में उनके घोषित अंतिम चुनाव में भी टिकट काट दिया। और यह हद थी कि अटलजी, आडवाणीजी व बीजेपी के खिलाफ बकवास करनेवाले सोनाराम को कांग्रेस से लाकर बीजेपी से लड़ाया गया। निर्दलीय जसवंत सिंह चुनाव हारे, जीवन से भी हारे और गंदी राजनीति से भी। भले ही कुछ लोगों की आत्मा को जीतेजी शांति मिल गई लेकिन समूचे देश को निर्विवाद रूप से जिन नेताओं पर गर्व और गौरव होना चाहिए, उस गरिमामयी राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर जसवंत सिंह का नाम चमकीले अक्षरों में दमक रहा है।
जसवंत सिंह प्रभावशाली थे, शक्तिशाली भी और समर्थ भी। वे आदमकद के आदमी थे। राजनीतिक कद के मामले में उनको विराट व्यक्तित्व का राजनेता कहा जा सकता है। व्यक्तित्व अगर विराट नहीं होता तो दार्जिलिंग के जिन पहाड़ों से उनका जीवन में कभी कोई नाता नहीं रहा, वहां भी 2009 में लोगों ने निर्दलीय जिताकर उन्हें संसद में भेजकर अपने पहाड़ों से भी ज्यादा बड़ी उंचाई बख्श दी थी। दरअसल पूरे विश्व के राजनायिक क्षेत्रों में जसवंत सिंह को एक धुरंधर कूटनीतिक के रूप में जाना जाता है। विदेशी सरकारों के सामने जसवंत सिंह की जो हैसियत रही, वह एसएम कृष्णा, नटवर सिंह और प्रणव मुखर्जी जैसे विदेश मंत्रियों के मुकाबले भी कई ज्यादा बड़ी रही। फिर जसवंत सिंह के मुकाबले आज के विदेश मंत्री का तो हमारे देश में ही कितने लोग नाम जानते हैं, यह अपने आप में सवाल है। याद कीजिए, क्या नाम है, जल्दी से याद भी नहीं आएगा। फिर, भारत की किसी भी पार्टी में विदेश के मामलों में उनकी टक्कर का कूटनीतिक जानकार हमारे हिंदुस्तान में तो अब तक तो पैदा नहीं हुआ और राजनीतिक कद नापना पड़ जाए तो आज की बीजेपी में तो खैर जसवंत सिंह के मुकाबले कोई टिकता ही नहीं।
देश के विपक्षी दलों में और दुनिया के भारत विरोधी देशों में भी जसवंत सिंह का सम्मान उतना ही था, जितना अपने दल में लेकिन राजनीति का भी अपना अलग मायाजाल होता है। और यह संभवतया बीजेपी का सनातन दुर्भाग्य है कि या उसके जन्मदाता नेताओं की किस्मत का दूर्योंग कि आज की राजनीति के जो नेता जो कभी उनके दरवाजे की तरफ देखते हुए भी डरते थे, वे आज उन्हें आंख दिखा रहे हैं। लेकिन किस्मत की भी अपनी अलग नियती है कि बौने लोग जब बड़े पदों पर बैठे लोगों की किस्मत लिखने लगते हैं, तो कुछ ज्यादा ही क्रूरता से लिखते हैं। राजनीति भले ही इसी का नाम होता होगा, लेकिन जसवंत सिंह की गरिमा, गर्व और गौरव का मुकाबला करने वाला आज तो इस देश की राजनीति में कोई नहीं है। राजनीति में पास पद तो कोई भी पा सकता है लेकिन उस पद के मुताबिक कद के लिए बैसाखियों के सहारे की बाध्यता उनकी किस्मत में है। इसीलिए यह कहना बहुत मुश्किल है कि जसवंत सिंह के राजनीतिक कद का कोई और नेता भारतीय राजनीति में आगे कोई पैदा होगा, फिर भी यदि हो, तो देश की किस्मत। राजस्थान के अब तक के सबसे बड़े नेता मोहनलाल सुखाड़िया व भैरोंसिंह शेखावत अब इस लोक में नहीं है और कांग्रेस में जीते जी सबसे विराट हो चुके अशोक गहलोत मुख्यमंत्री के रूप में छाए हुए हैं। उसी तरह दिग्गज राजनेता के रूप में जसवंत सिंह सबके दिलों में रहेंगे। गौरव का आंकलन सिर्फ इतने में कर लीजिए कि जसवंत सिंह जैसा राजनायिक सम्मान व राजनीतिक गरिमा पाने के लिए आज की बीजेपी के नेताओं को कुछ जनम और लेने पड़ सकते हैं।
-निरंजन परिहार (लेखक राजनीतिक विश्लेषक है)
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