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'वर्षावास के वसन्तोत्सव' को 'आत्मकल्याण के आनंदोत्सव' बनाने हेतु धर्मनगरी दादाई में हुआ मंगल प्रवेश 

दादाई( रानी): आध्यात्मिक पर्व की परंपरा में अपना विशिष्ठ महत्व रखने वाले चातुर्मासिक महापर्व के आयोजन हेतु रानी के समीप धर्मनगरी दादाई में श्री शांतिनाथ जैन श्वेताम्बर देवस्थान पेढ़ी के तत्वावधान में गिरनार तीर्थोद्वारक प.पु. आचार्यश्री नीतिसूरीश्वरजी म.सा. समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति प.पु. आचार्यश्री हेमप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनी गोडवाड दीपिका प.पु. साध्वीश्री ललितप्रभाश्रीजी म.सा. की शिष्या प.पु. साध्वीश्री संयमशीलाश्रीजी म.सा., प.पु. साध्वीश्री मौनशीलाश्रीजी म.सा., प.पु. साध्वीश्री जिनांगशीलाश्रीजी म.सा. आदि ठाणा का दिनांक 01/07/22 को चतुर्विध संघ के साथ धूमधाम से मंगल प्रवेश हुआ। चातुर्मास  निमित्त गली-गली रंगोली, तोरण, गवली व अन्य सजावट की गई थी। चातुर्मास के मुख्य लाभार्थी मातुश्री प्यारीबेन मियाचंदजी हस्ते पुष्पाबेन राजमलजी मुणोत है। जहाँ ग्रामवासी गुरूवर्या की एक झलक पाने के लिए उत्सुक थे, वहीं उनके आगमन का उल्लास चरम पर था। मंगल प्रवेश निमित्त शांतिनाथ जिनालय में भव्य अठारह अभिषेक का आयोजन विधिकारक मोतीलालजी देसूरी वालों ने किया, जिसमे सभी ने उमंग के साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
                    चातुर्मास प्रवेश पश्चात विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वीश्री ने सकल श्रीसंघ को तपस्या व आराधना हेतु प्रेरित करते हुए कहा कि अनन्त उपकारी भगवान महावीर ने आत्मकल्याण हेतु अनेक अनुष्ठान बताये हैं। चातुर्मास साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकाओं के लिए साधना व आराधना के माध्यम से आत्मचिंतन का अनमोल अवसर होता है। जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा है और अहिंसा का अर्थ है कि जहाँ तक हो सकें, अपनी मन-वचन-काया की क्रियाओं द्वारा सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की भी हिंसा न हो। उन्होंने यह भी कहा कि चातुर्मास में केवल साधु-साध्वी भगवंत ही स्थिरता नही करते बल्कि श्रावक-श्राविकाओं को भी स्थिरता रखकर धर्माराधना करनी चाहिए। साथ ही उन्होंने चातुर्मास के महत्व के बारे में विस्तार से बताते हुए सामूहिक मासक्षमण, सिद्धितप आदि तपस्या के लिए प्रेरित किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर श्री बाली जैन संघ के पदाधिकारियों की विशेष गौरवशाली उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा एवं संघ का मान बढ़ाया। साध्वीश्रीजी को वंदन कर श्रीमान बाबूलालजी ने अपने हृदय के उदगार प्रकट करते हुए कहा कि संपूर्ण गोडवाड में दादाई धर्मनगरी व भामाशाह की नगरी के नाम से विख्यात है। चातुर्मास दरम्यान साधु-साध्वी भगवंत धर्म की गंगा बहाकर 'प्रवृत्ति से निवृत्ति' की ओर ले जाने हेतु हमें प्रेरित करते हैं। इन चार महीने ये अपने ज्ञान की गंगा बहाएंगे। अब ये हम सब पर निर्भर है कि हमें ज्ञान गंगा में डुबकी लगाना है या नही? मंगल प्रवचन पश्चात चातुर्मास दरम्यान होने वाले आयोजन आदि की जानकारी साझा की गई| प्रवेश समारोह में साध्वीश्री को सर्वप्रथम कांबली वोहरने का लाभ श्रीमान राजमलजी मुणोत परिवार एवं सर्वप्रथम गुरुपूजन का लाभ श्रीमान जीवराजजी कोठारी परिवार
 ने लिया। श्री दादाई श्रीसंघ के पदाधिकारियों द्वारा लाभार्थी परिवार का बहुमान व अभिनन्दन किया गया।

              धर्ममय माहौल को प्रसिद्ध संगीतकार दीपक करनपुरिया ने भक्तिगीतों की स्वरलहरियों से सजाया तो संचालक विशालजी ने जैन साधु-साध्वी भगवंत के त्याग, तपस्या और संयम की व्याख्या करते हुए दादाई में विराजित भगवान शांतिनाथ की असीम कृपा की महिमा का बखान किया।

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