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देसूरी। इन दिनों देसूरी सहित आसपास के क्षेत्रों के खेतों की बाड़ों में सिर उठाए लम्बी चटक लाल-पीली पंखुड़ीयों वाला एक पुष्प राहगीरों का ध्यान काफी आकृष्ट कर रहा हैं। स्थानीय लोग तो इसकी विषक्तता के चलते इसे अनुपयोगी और विघ्नकारी मानते हैं। लेकिन दक्षिण अफ्रिका के ज़िम्बाब्वे देश ने इसकी सुन्दरता पर मोहित होकर इसे राष्ट्रीय पुष्प का दर्जा दे रखा हैं। ऐसा नहीं हैं कि इसके महत्व को केवल विदेशों में ही समझा गया हैं। तमिलनाडू ने भी इसे राज्य पुष्प के रूप में सम्मान दे रखा हैं। इतना ही नहीं, हमारे देश के ड़ाक तार विभाग ने तो इस पुष्प पर ड़ाक टिकिट तक जारी कर रखा हैं।

घरों से दूर रखा जाता हैं ‘कळकारी‘
यह पुष्प देसूरी से गुड़ा पृथ्वीराज बस स्टेंड़,सोनाणा व लांपी के सड़क मार्गो पर औसतन पांच सौ मीटर के अंतराल से दृष्टिगोचर होता हैं। खेतों की कांटेदार बाड़ों के बीच घनी हरीभरी बेलों के झुरमुट के बीच दिखाई देने वाले इस पुष्प को स्थानीय लोग ’कळकारी' अथवा 'कलकारी’ बोलते हैं। लोग इसे जहरीला बताते हैं और मानते हैं कि घर में लगाने से ’विघ्न’ अथवा ‘कलह’ पैदा हो जाती हैं। संभवत इसी वजह से यह ‘कलहकारी’ से अपभ्रंश होकर ’कलकारी’ कहलाने लगा। कई स्थानों पर यह ’कलिहारी’ या ‘कलियारी’ भी कहलाता हैं। यह हर वर्ष बरसात के दिनों में खिलता हैं और बरसात जाते-जाते कुम्हलाने लग जाता हैं।
इन दिनों यह कुम्हलाने के दौर में चल रहा हैं।

सुन्दरता ने रखा इसका नाम ‘ग्लोरियोसा सुपरबा’
इसका वैज्ञानिक नाम ‘ग्लोरियोसा सुपरबा’ हैं। जो ‘अत्यंत आकर्षक’ का पर्याय हैं। इसकी पंखुडियां चटक लाल और पीली होती हैं,जैसे कि अग्नि की लपटें उठ रही हों। इसी वजह से यह अपने देष में ‘अग्निशिखा’ भी कहलाता हैं। रामायण के अनुसार हनुमान जी लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाए थे। वह जगमग कर रही थी। शायद वह अग्निशिखा के ही फूल थे। यह बेल पर खिलता हैं। इसके अलावा इसे ‘बाघ पंजा’ सहित अलग-अलग प्रदेशों में अलग नाम से जाना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे ‘लौ लिली’ भी कहा जाता हैं।

अगल बगल के पेड़ पौधों का सहारा लेते हुए बेल ऊपर उठती है। इसके लिए उसकी नोकदार पत्तियां ही सहायक होती हैं. इसकी हरी कली पर लगे डंठल से नीचे की तरफ लटके हुए यह पुष्प जब खिलता है तो उसकी पंखुड़िया हलके पीले रंग लिए हुए हरी होती हैं। शनै-शनै पंखुड़ियों का रंग बदलता जाता है। वे पीली हो जाती है और सिरे लालिमा लेने लगते हैं। जब फूल विकसित हो जाता है तो डंठल को घेरते हुये पंखुडियां ऊपर की तरफ उठ जाती हैं। तीन चार दिनों में ही पूरा का पूरा फूल लाल हो जाता है। दो तीन दिन बाद पंखुडियां झड जाती हैं। इस तरह एक फूल लगभग आठ दिनों तक रंग बदलते हुये बना रहता है।

दक्षिण भारत के पहाड़ी प्रदेश का हैं यह पुष्प
विशेष रूप से दक्षिण भारत में भारत के कई राज्यों में इसकी खेती की जाती है। यह दक्षिण भारत की पहाड़ियों और हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। देहरादून की पहाड़ियों में यह बहुतायत में पाया जाता है। एक जानकारी के मुताबिक इसे प्रादेशिक पुष्प का दर्जा देने वाले तमिलनाड़ू में दो हजार एकड़ में इसकी खेती की जा रही हैं। वहॉं इसे ‘सैगेंथल’ पुकारा जाता हैं। इसकी बेल में फलियाँ लगती हैं जिसमें लाल रंग के बीज होते हैं। इन बीजों से पौधे उगाये जा सकते हैं. इसकी जड़ें गांठदार होती हैं और पौधे उगाने के लिए इस ट्युबर्स का भी प्रयोग किया जा सकता है।

जहर भी हैं और दवा भी
‘कोल्शिसाइन’ नामक तत्व इसकी अत्याधिक विषक्तता का कारक है और इसका सेवन आत्मघाती हो सकता है। इसके बावजूद यह फूल असाधारण औषधीय गुण से परिपूर्ण है। विषैला होने के साथ-साथ यह विषरोधी भी होता है। वनस्पति विज्ञानी इस पुष्पबेल की उत्पत्ति उष्णकटिबंधीय अफ्रीका और एशिया से बताते हैं। यह आयुर्वेद और यूनानी प्रणाली में एक प्रतिष्ठित दवा है। आयुर्वेद के अनुसार अल्सर, कुष्ठ रोग, बवासीर में यह उपयोगी है। हौम्योपैथी चिकित्सा में इसका प्राकृतिक रासायनिक यौगिक गठिया और आमवाती विकारों में उपचार के लिए बहुत उपयोगी माना जाता हैं। जहां देश के अन्य भागों में विगत कुछ वर्षों में इस फूल के पौधे का औषधीय प्रयोग के लिए बड़े पैमाने पर दोहन किया गया है। इसलिए वे लुप्त प्रायः हो गये हैं। वहीं,देसूरी इलाके में इसके औषधीय उपयोग के बारे में हाल तक कुछ भी सुना नहीं गया।

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