रूई बाहर से मंगाने के कारण किराया लगने से महंगाई अधिक हुई है। जिसके चलते बाजारों में 11 सौ से 12 सौ रुपए रजाई की कीमत हो गई है। जबकि पिछले वर्ष सात सौ से नौ सौ रुपए में अच्छे रजाई-गद्दे तैयार हो जाते थे। लेकिन दाम बढ़ने से अब ज्यादा ग्राहक पुराने रजाई-गद्दों की रूई पिनाई कर काम में ले रहे हैं। महंगाई के चलते रजाइयों के खरीदार कम ही आते हैं, जिससे अब मंदी का दौर चल रहा है।
देसी व्हाइट फाइबर रूई का बाजार में चलन अधिक
देसीव्हाइट फाइबर रूई का चलन अधिक बाजार में अधिक है। जिन्हें बाहर से मंगाकर रजाई तैयार करवाई जाती है। जीएसटी के कारण दामों में बढ़ोतरी होने से व्यापरियों का स्टॉक भी प्रभावित हो गया है। पुरानी रूई को पिनाने से श्रमिकों का काम चल रहा है। व्यापारियों का कहना है कि रूई कपड़े में दो से ढाई प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। बारिश के बाद सर्दी का असर बढ़ने के बाद भी बाजार रजाई बाजार मंदी की मार झेल रहा है। श्रमिक कामकाजी वर्ग बड़ा खरीदार उपखंड क्षेत्र में फैक्ट्री-कंपनियों में काम करने वाला श्रमिक और कामकाजी वर्ग है। अस्थायी निवासी होने से बाजार में हर साल उनकी खरीदारी निकलती है। गरीब तबका भी जरूरत के मुताबिक बाजार में निकलता है। महंगाई से वह ज्यादा परेशान हुए हैं।

No comments:
Post a Comment