दो साल में मर जाएंगे वैक्सीन लगवाने वाले?
नोबेल पुरस्कार विजेता लुच मोंटेनियर ने कहा है कि जो लोग कोरोना की वैक्सीन लगवा रहे हैं, वे दो साल में मर जाएंगे। यह मानवता के विरुद्ध एक तरह का घोर अपराध है कि जब दुनिया दहशत में जी रही है तो एक नोबेल विजेता नई किस्म की मूर्खता करके दुनिया को डरा रहा है।
नोबेल पुरस्कार जीतनेवाले कोई हरिश्चंद्र की औलाद नहीं होते कि वे सच ही बोलते हैं, आज सच्ची में यह भी साबित हो गया। और यह सत्य भी सार्वजनिक हो गया कि सारे नोबेल विजेता कोई बहुत गंभीर और दिमागवाले लोग भी नहीं होते कि दहशत में डूबी दुनिया के करोड़ों लोगों के दिलों में दोहरी दहशत फैलाने जैसी बातें कहने से पहले हजार बार सोचें। मतलब साफ है कि यह पुरस्कार भले ही महान होता होगा लेकिन उसे जीतने वाला हर आदमी महान नहीं होता, कुछ जमूरे भी होते हैं– फ्रांस के वायरोलॉजिस्ट लुच मोंटेनियर जैसे लुच्चे... जिसने कहा है कि कोरोना की वैक्सीन लगवाने वाले दो साल में मर जाएंगे लेकिन आप इसे मत मानिये क्योंकि लूच का यह दावा लुच्चई से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
वैक्सीन लगवाने वाले दो साल में मर जाएंगे, दिमाग से भी तेज भागते सोशल मीडिया पर आपको भी यह खबर जरूर मिली होगी। नहीं मिली तो मिल जाएगी। लाइफसाइट नाम की कनाडा की एक वेबसाइट है, जिस पर नोबेल विजेता और फ्रांस के इस वायरलॉजिस्ट लूच मॉन्टेनियर के दावे में कहा गया है कि जो लोग आज वैक्सीन लगवा रहे हैं, उनमें वैक्सीन की वजह से ही नए वेरिएंट पैदा होंगे और वे दो साल में मर जाएंगे। सच यह है कि कई सारे वैज्ञानिक इस दावे को गलत मान रहे हैं इसलिए दो साल में अपनी मौत हो जाने के डर से बाहर निकलिए। प्रोफेसर मोंटानियर होगा कोई नोबेल पुरस्कार विजेता लेकिन मनुष्य होने की वजह से निराधार, गलत एवं मानवीय मूल्यों के विपरीत प्रचार पाने की ललक लूच में भी हो ही सकती है और यह खबर उसी का नतीजा है।
हमारा हिंदुस्तान तो वैसे भी अजब देश है। चमत्कारों में विश्वास करने वाले और कायरपन को सरलता मानने वाले डरपोकों की फौज भरी पड़ी है। उत्तर प्रदेश की ही बात कर लेते हैं, जहां वैक्सीन के डर से बाराबंकी जिले के सिसौदा गांव में टीके से बचने के लिए लोग सरयू नदी के कूद गए। मेडिकल टीम हैरान रह गई। आंध्र प्रदेश में कोरोना की चमत्कारी दवा पाने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाती पंद्रह हजार लोगों की भीड़ जुट गई। ग्रामीण भारत में शिक्षा कम होने की वजह से लोगों में कोरोना को लेकर जागरूकता की वैसा भी कमी है। लोग बीमारी को ठीक से समझ भी नहीं पा रहे हैं और खतरा दोहरा है। ऐसे में लूच जैसे लुच्चों की बातों से तो न केवल दुनिया भर में वैक्सीनेसन का पूरा प्लान ही फेल हो जाएगा बल्कि पूरे हमारे हिंदुस्तान में तो वैसे भी दहशत का माहौल पसर सकता है।
हमारा देश तो वैसे भी हर गली-मौहल्ले के नुक्कड़ पर किसी चमत्कार की आशा में भगवानों की स्थापना करने और उनमें अपने जीवन की सफलता के दर्शन करने वालों का देश है। सेटेलाइट छोड़ने से पहले भी नारियल फोड़कर पूजा करके उसकी सफलता की कामना करने वाले हम लोगों के देश में तो हर गांव–गली में बाराबंकी जैसी सामान्य जनता बिराजमान है, जिसे जीवन से भी उतना ही भय लगता है, जितना मृत्यु से। ऐसे में जो लोग नोबेल पुरस्कार को जीवन में किसी महानता का प्रमाणपत्र मानते हैं, वे कृपा कर लूच मॉन्टेनियर जैसों से दहशत के दौर में जी रही इस दुनिया में जीने की उम्मीद बने वैक्सीनेशन को ही मौत का सामान बताकर एक और दहशत में डालने के मनुष्यता के विरुद्ध अपराध के नाम पर नोबेल पुरस्कार वापस लेने का प्रयास शुरू करें।
हम जानते हैं कि विज्ञान हमारे जीवन को सुरक्षित रख सकता है लेकिन यह भी मानते हैं कि वह जीवन से भी ज्यादा महान नहीं हो सकता और यह भी कि सामान्य जीवन में जीते जी मृत्यु का भय पैदा करने की आज्ञा तो विज्ञान भी नहीं देता। महान लोग जब हल्की बातें करते हैं तो वे उतनी ही हल्की गालियों के पात्र भी बन जाते हैं। लूच तो फिर दुनिया के सबसे महान गिने जाने वाले नोबेल पुरस्कार का विजेता है इसलिए दहशत फैलाने से पहले मर क्यूं नहीं गया का प्रलाप करने की इजाजत तो हमें भी मिलनी ही चाहिए। भला हो भारत सरकार की इज्जतदार न्यूज एजेंसी पीआइबी का, जिसके तथ्यों को जांचने वाले विभाग पीआबी फैक्टचैक ने तत्काल खंडन किया और दावे को खोखला साबित किया।
लुच मोंटेनियर को सन 2008 में नोबेल पुरस्कार मिला था। कुछ वक्त पहले ही लुच ने ऐसा एक और मूर्खतापूर्ण दावा किया था कि नए कोरोना वायरस में एचआईवी रेट्रोवायरस के एलिमेंट भी मौजूद हैं लेकिन प्रसिद्ध साइंस मैगजीन नेचर ने वैज्ञानिक के इस दावे को पूरी तरह से गलत बताया और पूरी दुनिया ने इसे ठुकरा दिया था। अब ये लुच अपनी लुच्चाई का नया दावा लेकर मैदान में उतरा हैं तो मेडपेज टुडे में छपे एक लेख में कई सारे वैज्ञानिकों ने इस आशंका को पूरी तरह से गलत बताया है। अब तो आपको भी यह मानना ही पड़ेगा कि सारे नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की तरह महान नहीं होते। कलयुग है और कलंक की कालिख पुते लोग हर क्षेत्र की तरह नोबेल में भी घुस आए हैं तो अपन सीधे-सादे लोग आखिर कर भी क्या सकते हैं!
निरंजन परिहार
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)


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